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तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे...

मेरे हिसार में भी, एक हिसार है
बस मुझे ही न पता था।
कल वो अचानक वहां नम्बूदार हुआ
कुछ लफ्ज़ थे, दो सितारे थे, आधा चांद था।
तब मुझे उस हिसार का दीदार हुआ।
ये महज कोई अफसाना नहीं है, बल्कि, मेरी ही नहीं ये सबकी हकीकत है। कल जिस हिसार से हम रूबरू हुए, वो उससे बिल्कुल जुदा था, जिसे हम रोज लोगों के समन्दर में सरसरी निगाह से देखते भर हैं। शायद ये उसी का असर है कि मैं भी थोड़ी सुफियाना हो चली हूं। बहरहाल ये जि़क्र 17 मार्च की उस मखमली शाम का है जो हमने पद्मश्री पूर्ण चंद और प्यारे लाल वडाली के सान्निध्य में गुजारी। बेहतरीन। ये वही अनुभव था, जब कभी यूं ही जीते-जीते, कोई पता लग जाता है, कि हां सचमुच जी रहे हैं।
हम आप हजारों बार गुजरे हैं उस राह से, बस, कोशिश ये होती है, कि इस भीड़-भाड़ को किसी तरह जल्दी पार कर लें। गुजरी महल की दीवार के साथ चलते-चलते, इस ऐतिहासिक धरोहर का हमारे पास कभी एहसास तक नहीं हुआ। पर कल शाम इस दुर्ग में बड़े-बड़े पत्थरों से होकर भीतर जाते, इसे निहारते एक गुमान सा हो आया अपने शहर पर। तो पहला सलाम तो उस सोच को जिन्होंने ऐसी कल्पना की और दूसरा उन तमाम शख्यितों को जिन्होंने इस सोच को अमलीजामा पहनाया। ये आर्टिकल उनके लिए तो है ही जिन्होंने ये शाम मेरे साथ होकर गुजारी, पर उनके लिए ज्यादा जो वहां हो न सके। तो आप भी चलें मेरे साथ इस बड़ी-बड़ी दीवारों की रहगुजर से। गेट से थोड़ा अन्दर जाते बाएं हाथ को कुछ सीढिय़ां नीचे की ओर जाती हैं, जहां लिखा है तहखाने। पढ़ते ही इसकी तहों में बेसाख्ता जाने को मन करेगा, पर अभी वक्त नहीं है, थोड़ा सीधा चलकर हल्का सा दाएं मुड़ फिर ऊपर की ओर जाना है। पत्थरों पर बिछे हरे कारपेट सुविधाजनक तरीके से ऊपर महल की छत तक ले गए। अब यहां उजली सी शाम और धुंधली सी रात दोनों बेताब, अगर मौका मिले तो दोनों हाथ खोलकर, आंखें मूंदर कर, एक लम्बी सांस लें, फिर उसे जिंदगी भर के लिए सहेज ले अपनी भीतर। थोड़ी देर में जब लोग इकट्ठा हो स्टेज की तरफ जाने लगे तो पता चला कि वडाली बंधु पहुंच गए हैं। और कुछ ही देर में उन्हें अपने सामने पाया। सुना है बड़े भाई पूर्णचंद पहले अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे। शायद इसीलिए उनके व्यक्तित्व में कहीं खालिस मिट्टी का कोई कतरा है, बिल्कुल अनगढ़ सा कोरा। आजकल की सेलीब्रेटीज से इतर बिल्कुल शांत, सरल स्वभाव, दो अन्तर्मन सूफी कलाकार हमारे बीच थे। ‘एक पल में हजारों हज हो गए जब तेरी दीद हो गई। तुझे तकया तो लगा मुझे ऐसा कि जैसे मेरी ईद हो गई।’ और ये भी कि ‘रात उनको भी यूं महसूस हुआ जैसे ये रात फिर नहीं होगी।’ खुद प्यारे लाल वडाली ने शुरू में कहा कि उन्हें गाना नहीं आता, सीख रहे हैं, आप सबके आशीर्वाद से गुनगुना लेंगे। और ये भी कि हमारी हिन्दी में पंजाबी मिक्स है, शायद समझने में दिक्कत आए। पर बिल्कुल नहीं आई क्योंकि दरअसल लफ्जों का इस्तेमाल हुआ ही नहीं, उन्होंने जो रुह से गाया, हमारी रुह को साफ-साफ समझ आया, कहीं बीच में भाषा की दीवार न हुई। हम बस सुनते रहे शब्दों की दरकार न हुई। एक के बाद एक नायाब शेर, सीधे फलक को जाते अलाप और तान, हारमोनियम, तबले और ढोलक की सीधी सरल थाप, शागिर्दों की तालियां, सब कुछ हमेशा शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। जमीं से थोड़ा ऊपर, खुले आकाश तले, वो गा रहे थे और सब सुन रहे थे, कल ही लगा कि आरती, पूजा, नमाज से इतर कभी-कभी सज़दा यूं भी किया जा सकता है। मैंने महसूस किया, जब वो सुना रहे थे, तब आसमां में आधा चांद, वो उसके पास वाला सितारा, कुछ फरिश्ते और वो खुदा, बस आंखें मूंदे सुन रहे थे, बोल थे ‘खुसरो रैन सुहाग की जो जागी पी के संग, तन मोरा, मन मोरे प्रीतम का, दोनों एक ही रंग।’ मैंने महसूस किया जब वो गा रहे थे ऊंची डयोढ़ी मेरे ख्वाजा की, तब, निजामुद्दीन औलिया, गुरु फरीद, आमिर खुसरो, बुल्ले शाह और शाहबाज कलन्दर सब एक-दूसरे की बांह पकड़े, सहारा देते एक-दूसरे को सीढिय़ों से ऊपर छत पर ला रहे थे। मैंने महसूस किया जब दमादम मस्त कलन्दर पर धमक तेज होने लगी थी। नीचे महल में गुजरी और तमाम रक्कासाएं नाच रही थी, दरबारी मुग्ध हो रहे थे। और सुल्तान फिरोजशाह तुगलक खुश थे कि फलक पर खुदा, जमीं पर दरबारी और वहां महल की छत पर उनकी रियाया सब खुश हैं।
-पूनम परिणिता 9468322525

गिव मी सम सन शाइन,सम रेन!

पिछले दिनों की बात,जब मैं फिल्म देखने गई थी। हल्की से कुछ ज्यादा ही ठंड थी। इतनी कि हाथ बार-बार जेब से बाहर निकाले जाने पर बुरा मान रहे थे,फिर एक-दूसरे से रगड़ कर अपना गुस्सा भी दिखाए देते थे। वहीं मैंने,बाहर ही, दो स्कूल बोर्डिंग लड़कियों को देखा, स्कूल यूनिफार्म में जो अच्छी लग रही थी। ब्राउन ब्लेजर और घुटनों से चार इंच ऊंची स्कर्ट। सर्द ठंडी हवा उन्हें तो साइड से क्रॉस कर जाती, मुझसे सीधी टकरा रही थी, शायद इसलिए भी सर्दी बढ़ती जा रही थी। उसके बाद वो मुझे दिखाई नहीं दी।
फिर बाद में वो मुझे हाल में दिखाई दीं, मुझसे तीन सीट आगे की रो में बैठी थीं। फिल्म मिस्ट्री थी, सो मैं उसमें खो गई। वो तो इंटरवेल के समय मुझे आसपास का भान हुआ तो मैं उठकर उनकी सीट तक जा पहुंची। हाय, मैं पूनम परिणीता..., हैलो..., दोनों ने मुझसे हाथ मिलाया। आपका नाम..., आई...म... मनीषा, दूसरी वाली ने अलबत्ता अपना चेहरा ब्लेजर के कॉलर में छुपाने की कोशिश करते हुए कहा कि मैं काजल। मैं यहां सही नाम इसलिए दे रही हूं क्योंकि जानती हूं, स्मार्ट जनरेशन ने नाम खुद ही मुझे बदल कर बताए होंगे। आज स्कूल नहीं है क्या? मेरा अगला प्रश्न था। वो...बंक किया है। अच्छा, तो कैसा लग रहा है, इज इट फस्र्ट एक्सपीरियंस? यह..., दोनों कहते हुए अपना उत्साह छुपा सा गई। सो, इन्जोयड मूवी एन्ड फस्र्ट एक्सपीरियंस।
नो...मनीषा ने कहा, अच्छा नहीं लग रहा। हम्म, मैं अंदर से इस बात पर सहमत नहीं हुई थी। घर पर किसी को पता है कि आप लोग यहां हैं। नहीं...। पर मम्मी को बता देंगे जाकर। अच्छा... कैसा लगेगा मम्मी को जान कर कि, बेटी ने उनका विश्वास तोड़ा है। मम्मी तो कभी एक सहेली के पास फोन करके वेरीफाई करने की कोशिश करें तो आसमान सर पर उठा लेती हो ना, कि मम्मा आप मेरी जासूसी मत किया करो। वाय डोन्ट यू ट्रस्ट मी। तो, आज ये सुन कर मम्मी नाराज नहीं होगी? मम्मी को पटाना आता है हमें, मना लेंगे। लगभग बेशर्मी से कहा था मनीषा ने।
अच्छा एक बात बताओ, अगर आते-जाते रास्ते में, कोई मिसहैप हो जाए, या यहां हाल में कोई आपसे बदतमीजी कर बैठे तो। सुना है, पिछले दिनों अपने यहां हिसार में दो लड़कियों को सरेआम काट डाला गया है। हां, सुना तो है... इस बात पर वो थोड़ा सहमी जरूर थी। बोली कुछ नहीं। अच्छा, फस्र्ट एक्सपीरियंस के नाम पर और क्या-क्या ट्राई करना चाहती हो, (हालंकि मैं खुद सोच रही थी, कि कहीं इन्होंने राक स्टार फिल्म वाली हीरोइन की फेहरिस्त गिनवा दी तो), नहीं... कुछ नहीं। ये भी आगे से नहीं करेंगे।
अब ये झिझक थी, डर था या फिर मुझे वहां उठाने के लिए रिलक्टेन्ट एटीट्यूड, ये मैं जान नहीं पाई। पर फिर भी, स्मार्ट जनरेशन की मम्मियों को थोड़ा स्मार्ट बनने की जरूरत तो है। बच्चियों से प्यार से, गुस्से से, मित्रता से, उनकी दिनचर्या, दोस्तों, स्कूल की एक्टिविटीज के बारे में पूछती रहें। थोड़ी जासूसी जरूर करें। इतना धोखा बच्चों को जरूर दें, जितना वो आपको दे रहे हैं। गिव मी सम सन शाइन, गिव मी सम रेन। इसके मायने थोड़े बदल दें। प्यार की बारिश की बारिश के साथ, थोड़ी गुस्से की धूप भी जरूरी है। बहुत बार ज़िंदगी दूसरा चान्स नहीं देती। जैसे नहीं दिया हमारी हिसार की दो बच्चियों को।
मुझे लगता है ज़िंदगी रहते, थोड़ा सा अन्याय कर लें हम अपने बच्चों के साथ, उनकी बेहतरी के लिए ताकि ज़िंदगी के बाद, न्याय के लिए भटकता ना रहना पड़े।
-पूनम परिणिता

ताकि हंसते हुए निकले दम...

लो एक कहानी गुनते हैं, काल, देश, देशांतर, समय, पात्र, सबकी पहचान कहानी के अंत में करेंगे, आपकी सूझबूझ के अनुसार। तीन बच्चे हैं, गोल-मटोल, प्यारे-प्यारे, तीनों ही अपनी-अपनी मां के बेहद दुलारे। एक के घर गुरबत का माहौल है और दूसरे खाते-पीते जमीदार घर से बावस्ता हैं, वहीं तीसरे का सामान्य कई भाई-बहनों का बड़ा सा परिवार है। ज़िंदगी अलबत्ता बिना भेदभाव अबाध रूप से चलती है सबके घर। वक्त के, सबको समान चौबीस घंटे ही प्रदत्त, लेकिन कहीं तो मिनट, घंटे, दिन काटना बेहद ही दूभर है, तो कहीं दिन कब चढ़ा, कब उतरा पता ही नहीं चलता। शुक्र बस इतना भर कि जिंदगी में से सबका एक ही दिन कटता है रोज।
चलो कहानी में रवानी के लिए पात्रों के नाम रख लेते हैं, एक का ‘क’, दूसरे का ‘स’ और तीसरे का ‘भ’। तीनों अब चौथी कक्षा में पहुंच गए हैं। बेहद गरीबी के रहते भी ‘क’ बहुत बड़े-बड़े सपने देखने का आदी है। मां से अक्सर कहता है, देखना तुझे एक दिन हवाई जहाज की सैर करवाऊंगा, दूसरे देश घुमाऊंगा। मां, उसकी बेपरवाह फैलती आंखों को देखकर डर सी जाती है। ना बेटा, मुझे नहीं घूमना, अल्लाह दो वक्त की रोटी इज्जत से दे दे, बहुत है। तूने आज की नमाज की या नहीं, बेटा शुक्राना किया कर, इस रूखी-सूखी के लिए भी।
‘स’ की बहनें उसके सारे नखरें उठाती हैं, तीन बहनों में सबसे छोटा है, पर उन पर खूब रौब झाड़ता है, बात-बात पर बात न करने की धमकी भी देता है। मां का बस चले तो उसे स्कूल भी ना जाने दे, जरा आंखों से दूर होने पर बेचैन हो जाती है। ‘भ’ की बात निराली है, बड़ा ही जिद्दी है, अपनी धुन का पक्का, जो ठान लिया, सो कर दिया। पढऩे का शौकीन, बचपन से ही अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है। जमीदार से बेहतर कुछ और करना है उसे। मां जब ठोढ़ी से पकड़ कर उसके बाल संवारती है, बड़ी कोशिश करती है उसकी आंखों को पढऩे की, पर वो पलक झपका कर, बंद कर देता, बड़ी-बड़ी आंखें।
वक्त का पहिया घूमता रहता है, सबके लिए समान, तीनों ही की उम्र जवानी की पहली सीढ़ी छू रही है। मस्से भीगने लगी हैं, उंगलियां छू-छू कर मूंछों के बालों के होने एहसास को महसूस करना चाहती हैं। बस उम्र के इसी पड़ाव पर सबको एक-एक आदमी मिलता है। ‘क’ ने एक दिन अब्बा से ईद के दिन नए कपड़े मांगे, अब्बू ने गरीबी और लाचारी के चलते मना कर दिया। दोबारा मांगने पर, बुरी तरह गुस्से से लताड़ दिया। तभी कहीं उन्हीं दिनों में मिला था वो आदमी। ‘क’ बड़ा ही प्रभावित हुआ शख्सियत से, वो उसकी बातों में खो सा जाता है, एक-एक लफ्ज सच, एक-एक लाइन में जिंदगी की असीम संभावनाएं। अब तक का जीवन साला गाली सी लगता है। जो ये कह रहा है सब सच है क्या। सब सच होगा क्या। सब सच हो गया तो, बस मां को हवा में उड़ाने का सपना भी सच। गुरबत से आजादी, मुक्ति।
‘स’ को जो मिला उसने उसे आम सा सपना दिखाया। थोड़ी सी कुछ ज्यादा कमाई का सपना, सरहद के आर-पार आने-जाने का काम है। वो घर पर कुछ ठीक नहीं बताता, कुछ लोग कहते हैं खुफिया नौकरी पा गया है। एक अलग तरह की आजादी यहां भी है। ‘भ’ को किसी ने दिखाया, सच्ची आजादी का सपना, जिंदगी को देश के नाम लिखने का सपना, समर्पण का, शहादत का सपना। जिंदगी के सफर में तीनों निकले अपनी-अपनी राह। ‘क’ के हाथों में मौत का हथियार, पर दिमाग में जेहाद।
‘स’ के बारे में कहा जाता है कि नौकरी के चलते उसका वास्ता भी गोलियों से पड़ता रहता है। ‘भ’ के हाथ में बम है, है तो ये भी मौत का हथियार। पर आजादी का ये परवाना कहता है कि इससे सिर्फ कान खोलना चाहता है बहरी सरकार के। धाय, धाय, बम, भड़ाक, खून, लाशें, कपड़ों के चिथड़े, दौड़ती-भागती सरकारें, एम्बुलेंस, बस, सक्वाड.....
सांस सांस रुकती जिंदगियां। वक्त भी एक सांस रुका था, पर फिर चल दिया। और अब है, धुआं, गुबार, बेतहाशा दर्द, रिसते घाव, मरहम पट्टियां, पुलिस, तफतीशें, कोर्ट-कचहरी, जज, अपीलें, तारीखें, फैसला। और फैसला है फांसी। क, स, भ सजा-ए-मौत...फांसी। यकायक मेरा मन अपनी कहानी के पात्रों से मिलना चाहता है। मैंने आवाज दी उन्हें उनके नाम से, पर एक बड़ा मंच सा उभर रहा है आंखों के सामने और धीरे-धीरे उतरता एक बड़ा सा काल परदा। मेरे किरदार कहीं नहीं हैं। अब तीन परछाइयां हिल रही हैं। मैं चाहती हूं तीनों को अलग-अलग कर दूं, उनके नाम, देश, देशान्तर, काल, समय यहां तक कि उन पर लगे आरोपों के हिसाब से, पर वो फिर हिल-हिल कर एक-दूसरे में समाती जाती हैं। मेरी मुश्किलें बढ़ाती जाती हैं। पीछे कुछ शोर सुन रहा है। कुछ लोग जोरों से बड़बड़ा रहे हैं शहादत, शहीद, आतंकवादी, चौराहे पर फांसी, स्मारक बनाओ, लाश दो। सब गडमगढ है, जैसे ये भारी शब्द मेरे किरदारों को खींच रहे हैं। पर कौन कह रहा है, किसके बारे में कह रहा, जरा भी साफ नहीं है कुछ भी साबित नहीं है। तीन अक्स और उभर रहे हैं। ये तीनों औरते हैं जिनमें से दो तो मां हैं और एक शायद बहन है। माएं जानती हैं कि बेटे को फांसी हो चुकी है, बेसाख्ता दर्द को जज्ब किए हुए है। दोनों बेटों ने अंतिम इच्छा में मां के लिए ही कुछ पैगाम दिया था। तीसरी बहन है, अपने फांसीयाफ्ता भाई के लिए दुआ कर रही है।
तीनों औरतों की परछाइयां मेरे किरदारों में अपनों को ढूंढ रही हैं। पर पीछे बढ़ता सरकारों का, देशों का, लोगों का शोर, फिर परदे को हिला कर एक-दूसरे से बदल देता है।
जिंदगी अपनी जंग हार चुकी है। हार हर हाल जिंदगी की हुई है। तब भी जब बम फटे, तब भी जब फांसी हुई।
हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू सरकारें कभी एकमत ना हो गई। शहीद कौन, आतंकी कौन। हारा कौन, जीता कौन।
-पूनम परिणिता

मन रे तू काहे ना धीर धरे...

विगत दिनों शक्ति और दौलत के दो बेताज बादशाह दिवंगत हो गए। बाला साहेब और पोन्टी चड्ढा। जहां एक ओर, शक्ति के स्रोत और फिर बुझी हुई राख में भी चिंगारी सी, ढूंढने की आदत के चलते बीस लाख लोग अंतिम यात्रा में पहुंचे। वहीं दूसरी ओर, दौलत के स्तंभ को शायद अभी तक अग्नि भी नसीब नहीं हुई है। डाक्टर अभी दूसरा पोस्टमार्टम करने की तैयारी में हैं, क्योंकि सोने का अंडा देने वाली मुर्गी में काट-काट कर सोने का अंडा देने का मुहाना ढूंढा जा रहा है, पर मिलेगा कुछ भी नहीं, मिलता, कभी कुछ भी नहीं। एक ओर मिलेगी कुल जमा सवा किलो राख और दूसरी ओर बस कतरा-ए-खून।
तो फिर क्यूं मन रे..., आम आदमी किसी की मौत का समाचार सुनकर आमतौर पर करीब पचास सेकंड तक सांसारिक नश्वरता पर मनन करता है। किसी को सामने मुर्दा देखकर यह अवधि सौ सेकंड तक बढ़ सकती है और शव दाह में अमूमन एक सौ बीस सेकंड, तब तक वाइबरेटर मोड पर किया मोबाइल, आपको वापिस इस शाश्वत संसार में ला छोड़ता है। आप साइड में जाकर धीमे स्वर में बोलते हुए आफिस से आया फोन सुनते हैं, खुद की प्रजेन्ट सिचुएशन बताते हुए, थोड़ी देर से आने की सूचना देते हैं और थोड़े निश्चंत हो जाते हैं, क्योंकि आपने इस सिचुएशन का भी फायदा उठाते हुए, खुद को बेहद चालाक साबित कर लिया है।
पर इस मन का करिए क्या, इसे तो दिलचस्पी है, बाला साहेब की निजी ज़िंदगी में थोड़ा और करीब से झांकने की। आंखें उस खबर को ढ़ूढती हैं, कैसे पोन्टी दाल, भुजिया की रेहड़ी से उठकर पूरी यूपी में सोमरस का देवता बन गया। सिर्फ डेढ़ हाथ का कर्मयोगी, कैसे हर पार्टी को समान नजर से देखता, सबसे सौहार्द रिश्ते बनाए रखता। वो सिर्फ हमारे भगवान कृष्ण के कर्मयोग के सिद्धांत में विश्वास रखता। दरअसल, गीता में भी सिर्फ कर्म करने पर जोर दिया है। सद्कर्म की बात या तो आई नहीं या इसे सब अपने तरीके से समझते हैं।
बाला साहेब शेर की तरह गरजते रहे, जिनकी दहाड़ से सभी चुप हो जाते। पर जब कभी घर में बच्चे-कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ते तो शेर गहन चुप्पी खींच जाता। पोन्टी एक लहर की तरह जीया, बस तूफान की तरह बढ़ती लहर। यूं चमचमाती ज़िंदगी लुभाती तो जरूर है, मन बोलता तो है, फिर धीर धरने को समझने, समझाने को कोई आदर्श हो। किसे देखकर जिये, कैसी ज़िंदगी जिए। भगवान के अवतार, जो मोक्ष का रास्ता बताते वो भी किसी दिन यूं ही अस्पतालों में साधारण मनुष्य की भांति, ऑक्सीजन की सप्लाई के चलते भी, विवश हो मर जाते हैं।
कोई है तो जिसे पता है, जन्म, मृत्यु, जीवन, मोक्ष, अनंत, शून्य। पर बताता कोई नहीं। गीता में अर्जुन को कृष्ण ने कहा कि मैं ही मारने वाला, मैं ही मरने वाला। तो दुर्योधन क्या इस ज्ञान को पहले से ही जानता था कि कृष्ण ही चीर हरण करने वाला है और कृष्ण ही चीर बढ़ाने वाला। बस ‘कर्म’ ही सर्वोपरि है। कि कर्म या कुछ भी अपने हाथ में है ही नहीं। फिर मन को कहना क्या ठीक है कि तू काहे ना धीर धरे।
-पूनम परिणिता

जो भी हो तुम खुदा की कसम....

अखबार में पढ़कर पता चला कि आज रूप चौदस है, सौंदर्य का पर्व। वरना तो इतना ही जानते थे इस दिन के बारे में कि छोटी दिवाली होती है पर सौंदर्य यानि क्या, परिभाषा क्या है, मापदंड क्या है, आदर्श कौन है और कब तक है। कैसे मोहित होते हैं हम पूर्णिमा के चमकते पूर्ण चांद पर, कुछ देर तक तो उस पर न्यौछावर रहते हैं, फिर अनायास ही नजरें उसके दूसरे पहलू पर पड़ती हैं, तो कभी गड्ढे दिखने लगते हैं, कभी दाग, तो कभी चरखा काटती बुढिय़ा। बस, फिर ये ही नजरें ढूंढने लगती हैं कोई और सौंदर्य, कहीं और पूर्णता।
कभी-कभी यूं ही कहीं, राह चलते, दिख जाता है कोई हसीन चेहरा, कहीं चाल में नजाकत, किसी अंदाज में नफासत और कभी पहरन में अदावत। दिल को भला तो लगता है, नजरें तो ठहरती हैं पर फितरत फिर कुछ तलाशने लगती है, कुछ और बेहतर। व्यक्तिगत तौर पर मुझे डायना बहुत सुंदर लगती थी, पर उस सौंदर्य का हश्र बड़ा भयानक रहा। जब उसके रूप पर कायल प्रिंस चाल्र्स ने उसे छोड़कर किसी और की सुंदरता को उससे बेहतर माना। उस वक्त उसकी मनोदशा क्या रही होगी। उस नाज की, उस मान की, उस गर्व की दशा क्या हुई होगी।
मुझे तब भी समझ नहीं आया था कि आखिर सुंदरता है क्या। लाखों-करोड़ों लोग नजर भर देखने को तरसते रहे और जिसे मन चाहे वो नजर फेर ले। फिर क्या कहता होगा आइना, लिपस्टिक भरते हुए होंठ क्या कुछ बुदबुदाते होंगे। कुछ ऐसा ही सौंदर्य, हेमा मालिनी, करिश्मा, श्रीदेवी और अब करीना का है। और कुछ वैसा ही हश्र भी। इन सब रूप सुंदरियों का रूप वहां टूट कर बरसा जहां पहले ही बारिश हो चुकी थी। सारी बात शायद मन को समझने और समझाने की है। सौंदर्य की ऐसी शृंखला में अचंभित करने वाला एक नाम और भी है ‘प्रियंका गांधी’। यहां भी शायद दिल का मामला भारी पड़ गया। कभी मुझे लगता है कि जैसे कहा जाता है ना कि प्यार अंधा होता है, यूं ही सौंदर्य के कानों में कुछ गड़बड़ होती है, जब तक उसके कान में ना सुन ले ‘तुम बेहद खूबसूरत हो’ तब तक ही कान ठीक काम करते हैं उसके बाद कुछ भी सुनना बंद कर देते हैं।
चलिये थोड़े आम सौंदर्य की बात करते हैं, हमारे-आपके सौंदर्य की, बस इतनी सी प्रॉब्लम है, आइना तो कहता है कि अच्छी लग रही हो, पर वो बोल नहीं सकता। और जो बोल सकते हैं उनकी आंखों के सामने अखबार, टीवी, कंप्यूटर, लैपटॉप या कानों में मोबाइल लगे रहते हैं। उनकी बस नजरों से समझना पड़ता है कि शायद ठी· ही लग रहे हैं। हालांकि किस्सा यहां कभी खत्म नहीं होता, क्योंकि हमारे पास प्रश्न और भी होते हैं, जैसे ये कलर सूट कर रहा है, शब्द बेशक फिर नहीं बोलें पर, गर्दन ने हिलकर कह दिया है, हां। फिर एक और प्रश्न है, मोटी तो नहीं लग रही, इस बार हाथ के इशारे ने दो बार हिलकर नहीं बता दिया है। बस आखिरी बात ‘ये सैंडिल ठीक लग रहे हैं’ ऊपर से चला सौंदर्य क्विज पैरों तक आ पहुंचा है। पर वो तो पहले प्रश्न को ही आखिरी पड़ाव बनाकर चलते हैं।
ज्यादातर कविता, गीत, संगीत, फिल्मी गाने अति सौंदर्य पर गढ़े गए हैं। इन सबमें औसत सुंदरता वाली कुछ लाइनें भी हैं, जिनसे आम सौंदर्य का भी जीवनयापन होता है। इन्हीं में से एक है चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था, हां तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था, बड़ी राहत वाला गाना है। ऐसी ही एक बीच की लाइन है, ना कोई किया श्रृंगार फिर भी कितनी सुंदर हो। और अंत में ‘जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो।’

-पूनम परिणिता

प्यारा इक बंगला हो...

शुरू तो दरअसल यहीं से होता है ये गाना, पर इसकी हकीकत में जाने लगेंगे तो, बंगले से, पहले तो, एक प्रोपर्टी डीलर हो, जो इस प्यारे बंगले का मोल भाव करा सके। ये बड़ा पुराना हसीन ख्वाब है, सब देखते हैं आपकी हैसियत के हिसाब से। पर भगवान पूरा करते हैं अपने हिसाब से। और अक्सर दोनों के हिसाब-किताब में काफी फर्क आ जाता है, क्योंकि प्रोपर्टी डीलर जो बीच में होते है। बहुत दिनों से एक कहानी लिखना याद रही थी ‘अपना घर’ बनाने पर। जिसमें मिसेज गुप्ता की पुरानी चाह है कि किसी तरह वो अपने पांच सौ गज वाले प्लॉट में बढिय़ा कोठी बना सकें। वहीं बिहार से आई सुगवा अपने मजदूर पति के साथ छत की तलाश में है। जिस दिन मिसेज गुप्ता के मकान की नींव पड़ी, सुगवा और उसके पति को मजदूरी मिल गई।
फिर सबसे पहले एक कच्चा ईंटों का कमरा बना, वो सुगवा और मुरली को दे दिया गया, ताकि सामान की रखवाली भी हो सके और साथ ही मजूदरी भी सुनिश्चित रहे और यूं सुगवा की तो भगवान ने सुन ली, उसे छत मिल गई। धीरे-धीरे नींव भरी, ईंटों का ढांचा उठना शुरू हुआ, मिसेज गुप्ता दिन-दिन भर खड़ी रह कर मकान का काम देखतीं। चौखाटे लग चुकी थी, फिर लेंटर पड़ा, लडडू बंटे, इधर सुगवा की भी गोद हरी होने की खुशी मिली। मिसेज गुप्ता देख-देख कर खुश होती कि मकान रूप लेने लगा है। एक ही बेटा था मिसेज गुप्ता का, दिल्ली में इंजीनियरिंग कर रहा था।
फाइनल ईयर था और प्लेसमेंट हो चुकी थी। गुप्ता जी चाहते थे कि डिग्री करके उनके कारोबार में हाथ बंटाये। मकान का नीचे का ढांचा तो तैयार था, पर मिसेज गुप्ता ने जिद की दो मंजि़ला बनाने की। एक साल के लगभग हो गया मकान बनते। बेटे ने नौकरी ज्वाइन कर ली थी बेंगलुरु में। बिजली, पानी की फिटिंग हो चुकी थी, पर लकड़ी और फर्श वालों ने जैसे घर से ना निकलने की कसम खा ली थी। दस महीने से टाइलों, ग्लास वर्क का काम चल रहा है।
अचानक बेटे ने सूचना दी की उसने साथ काम करने वाली लड़की पंसद कर ली है, शादी करना चाहता है तुरंत। तब तक सुगवा मकान में बने सर्वेंट रूम में शिफ्ट हो चुकी है। उसने इसे अपनी इच्छा से संवार लिया है, गणेश लक्ष्मी के बड़े पोस्टरों के साथ ही ऐश्वर्य और सलमान का फोटो भी चिपका दिया है, वो अभिषेक के बारे में जानती ही नहीं। मकान का काम बीच में रोककर शादी की रस्में शुरू हो गईं। महीने भर में बेटा बहु वापिस चले गये, मकान फिर शुरू हो गया। शुरू में खुला खर्च हो गया, अब पेंट के टाइम हाथ थोड़ा टाइट हो रहा है।
सुगवा को जुड़वां बच्चे हुए हैं। उसने दो पालने रख लिए है, अपने कमरे में वो खुश है। बच्चों को नहला-धुला खुले संगमरमर के आंगन मे सुला देती है। घर लगभग पूरा हो चुका है, मिसेज गुप्ता का सपना भी। उन्होंने सजाने के चीजों की खरीदारी शुरू कर दी है। पर बेटे ने संदेश भिजवा दिया कि पत्नी बीमार है और पास आ जाओ। एक महीना बेंगलुरु रह कर आई है, मकान पूरी तरह तैयार है। सुगवा को उसने नौकरानी रख लिया है। बहु फिर बीमार है फिर जाना होगा।
यूं बार-बार जाने से चार महीने निकल गए। गुप्ता जी पीछे परेशान होते हैं। निर्णय हुआ कि वहीं बेंगलुरु जाकर ही रहेंगे। दोनों बच्चों के पास। मकान को किराये पर दे दिया, डॉक्टर नयना ऐसा ही घर चाहती थीं रहने के लिए। मिसेज गुप्ता बेंगलुरु में है। डॉक्टर नयना, सुगवा मकान में सुखी से रह रही हैं। सुगवा कहती है मिसेज गुप्ता बड़ी अच्छी हैं। मिसेज गुप्ता को अब भी सपना आता है अपने घर में रहने का। मेरा ये स्टोरी लिखने का साइनोपसीस पूरा हुआ।
-डॉ. पूनम परिणिता

स्त्री पत्र

सीमा बिस्वास द्वारा अभिनीत, एक उम्दा प्रस्तुति रही, स्त्री पत्र। टैगोर द्वारा लिखित यह नाटक स्त्री के अस्तित्व और उसकी भूमिका पर कई प्रश्न चिन्ह लगाता है। यूं प्रश्न चिन्ह तो लगे हैं, पर स्त्री की भूमिका तय कौन कर रहा है? मर्द या खुद स्त्री। फिर अगर स्त्री खुद ही तय कर रही है, तो शिकायत क्यूं? शायद कभी, जब आदिम काल में, यूं घूमते-घूमते थक गए होंगे आदम और हव्वा, तो कहीं बसेरा करने की सोची होगी। पुरुष ने इकट्ठा किए होंगे घास-फूस, लकड़ी और एक छोटी पर्णकुटी बनाई होगी। तब स्त्री ने खुद ही खुशी-खुशी कहा-मैं कुछ बनाती हूं तुम्हारे लिए, थक गए होंगे ना तुम। फिर अपने हाथ से बनाया, प्यार से परोसा और मिल कर खाया। अंग्रेज़ी की एक कहावत है, मैन आर फोर हंट, वुमन आर फॉर हर्थ। यानि आदमी शिकार करेगा और स्त्री रसोई संभालेगी। पर आज भूमिका बदल रही है।
पहला सवाल तो मकसद का है कि जरूरत क्यूं पड़ी। आदमी जब घर से बाहर निकला, आमदनी के लिए, तब बच्चों को पत्नी के सुपुर्द कर के गया था, लेकिन अब जब नारी भी पुरुष के साथ बाहर निकलती है, तो बच्चों को किस के सहारे छोड़ कर गई। और अब ये जिम्मा आया, नौकर-चाकरों को दे दिया है तो संस्कारों की, मर्यादाओं की उम्मीद बच्चों से कैसे कर रही हैं। आरूषि अगर हेमचंद के हाथों पली-बढ़ी, तो ऐसे किस्से होने लाजमी हैं। जिस भूमिका का जन्म लालच से हो रहा है, थोड़े ज्यादा पैसे, थोड़ा ज्यादा ऐशो-आराम, थोड़ी ज्यादा आजादी, उसके बाद में विवाद ही जन्मेगा, सौहार्द की उम्मीद कम ही है। फिर हर बात को लेकर पुरुषों को निशाना बनाना तो बिल्कुल अजीब है। कहीं जरूरत तो खुद में झांकने की भी है।
ये महत्वाकांक्षाओं के भंवर में डूबी भंवरी, ये उडऩे को बेकरार फ़िजा, ये आसमां में उड़ती गीत गाती गीतिका। ये जब, खुद को, जिस्म को, स्त्री को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ती हैं, जब खुद को वस्तु बना देती हैं, तब क्यूं तनिक नहीं सोचती कि हर वस्तु की एक एक्सपायरी डेट भी होती है। स्त्रियों में एक इन्सटिंक्ट जन्म से होती है, खतरे को भांपने की, अपने शरीर पर हुई हर छुअन के पीछे का भाव समझने की। उसे भाव को अनदेखा करना या फिर उसका इस्तेमाल करना, उसकी पहली और आखिरी गलती होती है। उसके बाद सब नरक है, भले ही वो एकबारगी स्वर्ग जैसा दिखता हो। मेरा मकसद इन कांडों से पुरुषों को पाक साफ निकालना कतई नहीं है, पर थोड़ा ध्यान तो हमें अपनी बच्चियों पर देना ही होगा। बेटियां आजकल आधुनिक कपड़े पहन रही हैं। जींस पहन रही हैं, अच्छी लग रही हैं।
अच्छा है, पर एक बार जब वो बाहर जा रही है,किसी के पीछे स्कूटर पर बैठ रही है,तो मां होने के नाते पीछे से देखे जरूर कि छोटे टॉप और लो वेस्ट जींस के बीच की जगह,यूं सबके देखने के लिए चीज नहीं है। उसे प्यार से समझाएं जरूर कि बेटी, हर एक फ्रेंड जरूरी नहीं होता। मां-बाबा से आजादी के नाम पर लिए स्कूटर, मोबाइल और पैसों का उपयोग कम से कम उन्हीं को धोखे में रखने के लिए ना करें। बिल्कुल ये ही सब बातें बेटों पर भी उतनी ही शिद्दत से लागू हैं। पर शालीनता की अपेक्षा बेटियों से ज्यादा है। बेशक सदन में बैठकर फिल्म देखने वाले मंत्री बड़े गुनाहगार हैं, पर इससे यूं फिल्म बनकर उपलब्ध उस स्त्री का अपराध क्या कम हो सकता है। अपने चरित्र की रक्षा की पहली जिम्मेदारी तो हमारी खुद की है।
ये मेरी सोच है कि आजकल यूं नौकरी के पीछे भागती इस फेयर जेंडर में वो बेहतर है जो नौकरी के काबिल तो है, पर अपने बच्चों को संस्कार,प्यार और घर को एक प्यारे से घर जैसा माहौल देने के लिए घर पर ही है। वो जो ये जानती है कि थोड़े से ज्यादा पैसों से वो ये सब चीजें कभी नहीं खरीद पाएगी। ये भी कुछ-कुछ स्त्री पत्र ही हो गया। चलिए पुरुषों की बात फिर कभी करेंगे। जरूरत तो उन्हें भी रहती है कि कोई पुरुष पत्र भी लिखे।
-डॉ.पूनम परिणिता

तुझसे नाराज नहीं ज़िंदगी...

अच्छा गाना है, पर मायनों में जाते हैं तो जरूर उलझ जाते हैं। तुझ से नाराज नहीं ज़िंदगी हैरान हूं मैं। गोया कि गीतकार बी पॉजीटिव भले ही ना हो पाया,पर न्यूट्रल जरूर हो गया। बस इतना ही भला, ज़िंदगी से नाराज होने की बजाय हैरान हो जाइए। यूं बाकी घर दफ्तर, बाजार, सब कुछ है आपको हैरान-परेशान करने को। पर सबसे ज्यादा हैरान आप रिश्तों को लेकर हो सकते हैं।
कल एक पुरानी दोस्त का फोन आया था। तमाम सफरों से होते हुए बातें रिश्तों पर टिकी और फिर बातें रिश्तों से आंसुओं पर। कॉलेज टाइम में वह मेरी ऐसी देर रात डिस्कशन वाली सहेली नहीं थी पर जाने कौन-सी दुखती रग कब टच हो गई कि उसका सैलाब बह गया। मुझे रोते हुओं को चुप कराना नहीं आता। किसी के आंसुओं और दुख से मैं बस असहज हो जाती हूं। ये कह कर रिश्तों से नहीं छूटा जा सकता कि अब इनमें वह बात नहीं रही।
तमाम अनुभव, सारी खटास मिठास अपने स्वादानुसार पहले भी बकायदगी से मौजूद रही है, वह जब घर का कोई बड़ा भाई नौकरी करने शहर जाता है, फिर बाकी भाइयों को पढ़ाने की जिम्मेदारी उठाता, दो-तीन बहनों की शादी करता, भाइयों की नौकरी लगवाता, तब कहीं जाकर अपने बच्चे संभालने का वक्त आता और तभी कहीं वही भाई-बहन कहीं जाने-अनजाने उसे उसकी हैसियत बता देते।
बड़ा मुश्किल होता है तब खुद को संभालना, एकदम तो विश्वास ही नहीं होता कि छोटा ये कह सकता है कि मैं भी अफसर बन सकता था अगर टाइम पर मेरी सहायता कर दी होती कि छुटकी भी इतने सालों बाद ये उलाहना दे सकती है कि उसकी शादी में गहने कहां पर्याप्त थे। और वही वक्त होता जब पत्नी-बच्चे भी थोड़ी धीमी आवाज में कह देते कि पापा इन भाई-बहनों के चक्कर में आपने हम पर कभी पूरा ध्यान नहीं दिया।
तब उस जमाने में भी ढूंढ़ा जाता था रिश्तों की उलझन में से आखिरी सिरा। बात शायद आज भी वही है, वहीं है। बस थोड़ा दिखावा और बढ़ा है। आंसू तब भी या तो अकेले में, किसी के कंधे पर या फिर थोड़े दिखते, थोड़े छिपाते ही बहाये जाते थे। पता नहीं आंसुओं की फितरत ही ऐसी है, लाख छुपाए पर आखिरी आंसू तक उसकी बाट देखता है जिसके लिए बहाए जा रहे हैं या जिसकी वजह से बहाए गए।
यूं आजकल नए रिश्तों में खुलापन ज्यादा है, पर हम स्पेस की पूरी व्याख्या कहां कर पाते हैं? बस यही स्पेस कब दरार बन जाता है ये नहीं पता लगता। निबाहे जाना, एक और मजबूरी है, तिस पर मुस्कुराहट के साथ निबाहना, अंदर दर्द को इकट्ठा करता रहता है। वो फिर यूं ही किसी दिन किसी के सामने निकलता है।
बस रिश्तों को तो यूं ही देखते रहे ऊपर से, वैसे साफ सफेद कपड़े पर रेशमी धागों की कशीदाकारी, देखे और खुश रहें, कहीं पलट कर पीछे देख लिया तो उलझे मिलेंगे रेशमी धागे। कहीं-कहीं गांठ भी लाजमी है। दो बार, चार बार यूं ही उलट-पलट देखिए, कभी कशीदाकारी को, कभी उलझनों को और फिर लंबी सांस लीजिए। अब धीरे-धीरे गुनगुनाइए... हैरान हूं मैं, हो...हैरान हूं मैं।
-डॉ.पूनम परिणिता

बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया...

आज एक बार फिर इंडोनेशिया याद आया है, पर संदर्भ अच्छा नहीं है। जब मैं वहां गई थी, तो चार युवा साथियों का एक समूह हमें लेने आए। बच्चे कहूंगी उन्हें, क्योंकि 17-20 वर्ष की उम्र के होंगे वे सब। हमें देख कर वे इतने खुश हुए और इतनी आत्मीयता से मिले कि क्षण को भी ये नहीं लगा कि कहीं दूर देश में आए हैं। हमारा सामान उठाए, हमें यूनिवर्सिटी कैंपस में फैकल्टी हाउस में रूम में पहुंचाया। हमारे लिए खाने के अलावा, कुछ बढिय़ा खाने की चीजें भी वे लेकर आए थे। कितना सोचा होगा पहले से हमारे बारे में। हमारे टेस्ट के बारे में, हमारे कंफर्ट के बारे में, फिर सारे इंतजाम किए। उन्हीं में एक था बीमो, पूरे नाम का मतलब उसने बताया कि राजसी होता है। ओलिबीया, चित्रा और सोम्या । इन नामों के हिज्जे भले ही अंग्रेजिय़त दिखाते हों, पर असलियत में ये हिंदुस्तानी नाम हैं, अपने सही अर्थों के साथ। इंडोनेशिया में भारतीयों को बड़े ही प्यार से ट्रीट किया जाता है। वहां रामायण, महाभारत, भारतीय नृत्यों को बड़ी इज्जत से देखा जाता है। मतलब ये कि जब तक हम वहां रहे, सब बच्चों ने, फैकल्टी ने, यहां तक कि आम लोगों ने यादगार लम्हे हमें दिए। वहीं बीमों, ओलीबिया, सोम्या ने कहा कि भारत आना उनके लिए एक हसीन सपने जैसा है, वे चाहते हैं कि किसी भी तरह ये सपना पूरा हो जाए।
मैं सोच रही थी कि सपनों का पूरा ना होना अगर पैसों की कमी के चलते हो तो कितना दुखद है। तभी कहीं विचार आया था कि कोई फंड बनाया जाए जो इन लोगों की इंडिया में आने में मदद करे। उनमें से सोम्या के कोई दादा परिवार के लोग केरल से संबंधित हैं और सोम्या के पापा, जकार्ता के पास किसी जगह पर एक भारतीय रेस्तरां चलाते हैं। और अगले दिन वह खुद हमारे लिए दक्षिण भारतीय मजेदार भोजन बना कर लाए थे। वे जिस अंदाज में हमें मै-दा-म बोल रहे थे, अच्छा लगा था। उन्होंने ही बताया कि वे सोम्या को आगे की पढ़ाई के लिए भारत भेजना चाहते हैं। और उसकी शादी भी वहीं करना चाहते हैं। जब-जब भारत की तारीफ होती, हमें अच्छा लगता। मन पता नहीं कब बड़े गर्व से भर जाता। एक फंक्शन में सोम्या ने हमारे साथ साड़ी पहनी, वह बड़ी अच्छी लग रही थी। उसका रंग गहरा है, आंखें बड़ी-बड़ी हैं, बाल घुंघराले। वह खालिस दक्षिण भारतीय सुंदरता है। मैं जब से इंडोनेशिया से आई, कुछ ऐसी व्यस्त रही कि उन दोस्तों से ज्यादा संपर्क नहीं रख सकी। पर एक जुलाई को मैसेज मिला कि सोम्या को दिल्ली युनिवर्सिटी में दाखिला मिल गया है और वह चार जुलाई को दिल्ली पहुंच रही है। फिर पता लगा कि उसे एडजस्ट करने में मुश्किल हो रही है, लेकिन कल जो पता लगा वह शर्मनाक था कि वह एक शाम ईव टीजिंग का शिकार हुई।
बेहद दुख हुआ है। एक निजी शर्म की बात लग रही है। जीवन में सपना देखना, उसे पूरा होते देखना फिर उसका दु:स्वप्न में बदल जाना देखते-देखते, कितना बुरा लगा होगा उसे। इंडोनेशिया की बसों, ट्रेनों में, इतना अच्छा माहौल देखा था मैंने और बेहद एप्रीशिएट भी किया था। किसी को किसी से अनावश्यक मतलब नहीं। मदद के लिए बेशक हाजिर हैं पर किसी की बदनजऱ मुझे नहीं आई। और हमारे यहां आए लोगों से ऐसा व्यवहार, क्या किया जाए। कैसे किया जाए। शुरू कहां से करें। बहुत सारे सवाल हैं। जवाब कहीं नहीं, कोई नहीं है। सिवाय ढेरों शर्मिंदगी के। ऐसी ही एक बुरी खबर असम की टीवी पर बार-बार दिखाई जा रही है। लड़कियों के मामले में, मुझे भ्रूण हत्या, दूसरे दर्जे की समस्या लगती है। पहली ये है कि जो लड़कियां हमारे पास हैं, साथ हैं, उन्हें सुरक्षित माहौल दिया जाए। एक जीने लायक जीवन, फिर इन्हें भ्रूण हत्या के मायने समझाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, वरना कौन जाने, भ्रूण हत्या समस्या ना हो कर समाधान लगने लगे।
डॉ. पूनम परिणिता

चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिए...

इक चैन ही ना मयस्सर मेरे दिल को कभी,
यूं बहलाने के, फुसलाने के तरीके बहुत हैं।
पिछला पूरा हफ्ता सुपर स्टार के शोक से गमज़दा रहा, लबो-लुवाब ये रहा कि बाज़ार में आनंद फिल्म की सीडी कहीं नहीं मिल पाई। बीमार तो राजेश खन्ना काफी अरसे से थे, पर ये उम्मीद नहीं थी कि यूं चले जाएंगे और अवाम को इस कदर रुला जाएंगे। पर साबित कर गए कि जिए तो सुपर स्टार की तरह, दुनिया को अलविदा कहा तो सुपर स्टार की माफिक।
पर एक बात मुझे साल रही है वह है सभी का ‘पोसथोमस बिहेवियर’ यानि फैंस ने, फैमिली ने, अमिताभ बच्चन ने जो किया, इसका आधा भी कहीं राजेश खन्ना के रहते किया होता तो शायद कुछ पल सुकून लम्हे उस ज़िंदगी को लंबा ना सही बड़ा तो जरूर कर जाते। पर ज़िंदगी और मौत तो ऊपर वाले के हाथ में है जहांपनाह! रामायण में भी जब रावण को आखिरी तीर लगता है और वह बस मरने को ही हैं, तब श्री राम, लक्ष्मण से कहते हैं कि रावण बड़े ही ज्ञानी, वेदों के ज्ञाता हैं, तुम इनसे ज्ञान प्राप्त करो और लक्ष्मण रावण के पैरों के पास खड़े होकर हाथ जोड़ कर विनती करते हैं तो रावण उन्हें ज्ञान देते हैं। पर यही निवेदन कहीं राम के कहने पर लक्ष्मण विनम्रता से रावण के चरणों में बैठ कर उसके जीते जी कर पाते तो लंका कांड कदाचित बदल सकता था।
बस यूं ही, राजेश खन्ना के जीते जी गर उन्हें जरा भी आभास हो जाता कि लोग अब भी उन्हें उतना ही चाहते हैं, उन्हें सुपरस्टार मानते हैं, उन पर मरते हैं, तो शायद थोड़ा चैन से मरते हमारे सुपर स्टार। फैमिली उन्हें थोड़ा और जल्दी संभाल लेती। डिम्पल कपाडिय़ा उनके हाथ को थोड़े ज्यादा महीनों पहले पकड़ लेती तो शायद ज्यादा देर तक पकड़े रख सकती थीं। अमिताभ कभी प्यार से थोड़ा झुक कर पहले उन्हें कह पाते कि सुपर स्टार सिर्फ आप ही हैं। ‘आनंद मैं तुम्हें यूं रोज-रोज मरते नहीं देख सकता’ तो शायद आनंद कभी मरते नहीं। पर ये भी बड़ा सत्य है कि हम सब ऊपर वाले के हाथ की कठपुतलियां हैं, किसका कितना रोल हैं कैसा रोल है, कब टाइम खत्म होगा, कब पैक अप होगा, सब तय है।
सांसें चल रही हैं तो, कितना करोड़ सांसें ले ली, कोई गिनती नहीं, पर नहीं है तो फिर एक भी नहीं। प्यार हमारे भीतर है, अथाह है, पर दिखने-दिखाने के लिए बड़ी हिम्मत मांगता है, कभी-कभी तो सिर्फ तभी दिखा पाते हैं, जबकि उसे दिख भी नहीं रहा जिसे दिखाया जा रहा है और नफरत इतनी भीतर छुपा कर रखते हैं पर जाने कब आंखों में दिखाई दे जाती है। हरकतों में बयां हो जाती है।
बहरहाल, एक दुआ है हमारे सुपर स्टार की चिर शांति के लिए। नफरत की दुनियां को छोड़ कर प्यार की दुनिया में
खुश रहना...।
-डॉ. पूनम परिणिता

दो जिस्म मगर एक जान हैं...

यह कहानी स्तुति और आराधना से शुरू होती है। मध्य प्रदेश के बैतुल जिले के सरकारी अस्पताल में जब एक मजदूर महिला ने दो बच्चियों को जन्म दिया जो जन्म से एक दूसरे से जुड़ी थीं। दंपति ने उन बच्चियों को घर ले जाने और उनका लालन-पालन में असमर्थतता जताते हुए उन्हें अस्पताल में ही छोड़ दिया। उस सरकारी अस्पताल में जो खुद मुश्किल से जी पाता है। पर अस्पताल ने, स्टाफ ने, उन प्यारी बेटियों नो न सिर्फ पाला बल्नि डॉ. राजीव चौधरी ने उन्हें अलग कर उनकी खुद नी पहचान दी। दुनिया भर के लोग भले ही पानी पी-पी कर सरकारी अस्पतालों को, सरकारी डॉक्टरों को कोसें पर सिर्फ स्तुति और आराधना हमेशा-हमेशा इन्हें याद रखेंगी। एक स्व के लिए, एक अपनी अनुभूति के हमेशा आभारी रहेंगी।
सत्यमेव जयते ने भले ही डॉक्टरों की, डॉक्टरी पेशे की जो भी तस्वीर पेश की है पर मैं जिन डॉक्टरों को निजी तौर पर जानती हूं, उनमें से एक तो बेहद ही भले मानुष हैं और बाकी भी भले हैं, हां मानुष भी हैं ही। बहुत सी लेडी डॉक्टर्स भी मेरे संपर्क में हैं उनमें से कुछ तो अपने पेशे से इतर समाजसेवा में या व्यक्तिगत तौर पर इतनी मजबूत हैं कि उनकी ज़िंदगी अपने आप एक मिसाल है। दरअसल पहले तो इतनी सारी पढ़ाई ही ज़िंदगी का एक अहम और सुहावना पहलू निगल लेती है, तिस पर गांव की कुछ पहली पोस्टिंग्स। अपने लिए जीने की फु़र्स़त थोड़ी देर से ही मिल पाती है, लगभग तब जब बच्चे बोलने लायक हो जाते हैं। तभी बच्चों के पढ़ाई के बारे में सोचते ही शहर की पोस्टिंग के बारे में सोचा जाता है लेकिन यहां भी मरीज, बीमारियां, नाइट शिफ्ट, एमरजेंसी कॉल, पेंशन ड्यूटी, ब्लट डोनेशन कैंप, वीआईपी ड्यूटी, फिर घर परिवार आम जीवन की टेंशन ने साथ-साथ आमिर खान और कीर्तन भजन मंडली को भी झेलना होता है।
प्राइवेट, डॉक्टरों से मेरा ज्यादा वास्ता नहीं पड़ा। सो कह नहीं सकती। हां, खुद बीमार पडऩे पर जरूर बिल्कुल आम आदमियों की तरह ही सारे टेस्ट और हाई फीस संकटों से गुजरती हूं। कई बार नोट किया है कि प्रोफेशनल भाईचारा प्राइवेट फीस के आड़े कम ही आता है। इस बीच मैं उनका भी जिक्र करना चाहूंगी जो सरकारी अस्पताल में कार्यरत थे, बेहद काबिल डॉक्टर। बड़े ध्यान से मरीज की बात सुनते, बड़ी कैफियत से दवाई लिखते, मरीजों को आराम होता। बिना बात एक बार उनका ट्रांसफर मेवात़ कर दिया गया। शरीफ डॉक्टर थे, बदली रुकवा नहीं पाए, नौकरी छोड़ दी। प्राइवेट अस्पतालों के साथ काम करने लगे।
काबिल थे, काबिलियत पैसा बरसाने लगी फिर छोटा सा अपना अस्पताल खोल लिया। वह अब तक भी शरीफ ही थे। पर पिछले कुछ समय से देखा है कि उस छोटे से अस्पताल ने शहर में बड़े मौके की जगह पर एक बहुत बड़े अस्पताल का रूप अख्तियार कर लिया है। फिर उसमें बड़ी-बड़ी मशीने लगेंगी, दवाइयों की दुनाने, टेस्ट लैब। अस्पताल की मंजि़लें जैसे-जैसे बढ़ती जा रहीं हैं, मुझे डर सा लगता जा रहा है। वह डॉक्टर कब तक शरीफ बने रहेंगे? आखिर लोन तो उतारना ही पड़ेगा, फिर क्या होगा? आखिर इस सब में भुगतेगा कौन? पर बात तो यह भी है कि शुरुआत किसने की।
पिछले दिनों डॉक्टरों नो सुधारने के लिए काफी अभियान चले हैं। पता नहीं क्या किसी ने सिविल अस्पताल में खंडहर बन चुके डॉक्टरों के रिहायशी आवासों को ठीक करने के बारे में लिखा है। ये एक अहम कदम हो सकता है। परिसर में रहने से डॉक्टर मरीजों के करीब रहते हैं। बहरहाल, बस एक बात अब तक जरूर जान पाई हूं कि डॉक्टर मरीज को मारते नहीं हैं। हां, जान बचाने के हजारों केस रोज सामने आते हैं। पैसे की एक अलग दुनिया है उसके सामने सब नतमस्तक हैं। जीवन भी, मौत भी।
-डॉ.पूनम परिणिता

तुम जो मिल गए हो...

...श... कृपया शांति बनाए रखें। भगवान मिल गए हैं हालांकि हम तो बहुत पहले में ही कह रहे थे कि ‘कण-कण में भगवान हैं।’ एक फिल्म भी बनाई थी, इस टाइटल पर किंतु यूरोप ने अब तक साबित कर देने की मोहर लगा दी और यूरोप की कही बात में सबको वजऩ नजर आता है।
पर एक अजीब बात हुई, कुछ फर्क नहीं पड़ा, कल जब भगवान नहीं मिले थे और आज जब मिल गए हैं। अगर यही कण कहीं भारत में मिला होता तो अब तक लाखों टन दूध चढ़ा दिया होता, लार्जर हाड्रोन कोलाइडर पर करोड़ों फूल बरसा दिए होते और छप्पन भोग लगा दिए होते तरह-तरह के आभूषण कपड़े और इतने रुपए पैसे चढ़ावे में बरसा दिए होते कि इस मशीन को बनाने की लागत निकल आती। अब वह लाख कहते रहें कि भगवान नहीं हैं, बस एक कण मिला है जो बाकी कणों को द्रव्यमान देता है। इससे सृष्टि की रचना कैसे हुई जानने में मदद मिलेगी। पर वे क्या जाने, सृष्टि मतलब दुनिया और रचने वाले हमारे श्री भगवान।
आज भले ही इन कणों को इलेक्ट्रोन प्रोटोन, न्यूट्रोन हिब्स बोसोन कह लें, कल फिर इन्हें फिर इन्हें पता चलेगा कि ये दरअसल ब्रह्मा विष्णु महेश ही थे। और ये थ्योरी भी कोई नई नहीं है कि इस कण से ही सबको द्रव्यमान मिलता है। अब पिछले दिनों की चर्चा में रहे बाबा को ही देखें सीमेंट का ठेका लेते थे, वह बात नहीं बनी, ईश्वर की कृपा आनी शुरू हुई इतना द्रव्यमान मिला, आज अरबों के मालिक हैं। किसी एक बाबा भक्त का नाम लें जो भी इस ईश्वरीय कण से जुड़ा है द्रव्यमान इतना बढ़ गया कि संभालने के लिए संस्थाएं बनानी पड़ती हैं।
दरअसल, मुझे भी बड़ी प्रतीक्षा थी भगवान को जानने की, मिलने की, अच्छा हुआ मेरे रहते ही खोज लिए गए। नहीं, अनपढ़ों वाली बात नहीं कर रहा हूं। अच्छा लगता है, साइंस को भगवान से जोड़ कर देखना, भगवान को साइंटिफिकली प्रूव होते देखना। सब पता चल जाए। कृष्ण जी के महारास का रहस्य, सीता माता के पृथ्वी में समा जाने का राज़, रावण के दस सिर, मां दुर्गा के आठ हाथ। विष्णु का सुदर्शन चक्र, कुरान के खुदा की ताकत, बाइबिल के क्राइस्ट की असली वेदना, यीशु के जन्म के समय की आलौकिकता। सब, सब जान जाएं और फिर जी भर ने हंसे इन धूप अगरबत्तियों, चढ़ावे, प्रसाद, मंदिरों पर कि बेकार ही इतने पैसे वेस्ट किए सब चीजों पर वापिस मांग ले नामदान, ये दान, वो दान के नाम पर दिए अपने सारे पैसे। शायद वैश्विक मंदी से भी निजात मिल जाए।
अरे रुको, रुको, अभी कुछ साबित नहीं हुआ है, जो कुछ मिला है निहायत ही फिजिक्स है। अपने भगवान से इसका कुछ लेना-देना नहीं है। ये कुछ ऐसा है जैसे पीटर हिग्स ने वो कण देखते ही कहा हो, ओह! माई गॉड मिल गया। जहां तक अपने भगवान की बात है, वे माशा अल्लाह हैं और खुदा कसम यूं ही अपने शानो-शौकत से बने रहेंगे और भगवान करें बने भी रहें क्योंकि भगवान आप हैं तो हम हैं, हम हैं तो आप हैं...
-डॉ.पूनम परिणिता

एक गिलहरी, अनेक गिलहरियां...

पिछले कुछ दिनों से दोस्तों की फे़हरिस्त में एक नया नाम जुड़ा है। वो टम्मो है, क्योंकि मुझे उसका असली नाम नहीं पता, सो ये नया नाम मैंने उसे दे दिया है। वो एक गिलहरी है, जो रोज मेरे कमरे के एसी के ऊपर उठी हुई खिड़की पर आती है। मैंने उसे एक दिन यूं ही देख लिया, वो उस लेटी हुई खिड़की पर उछल-कूद कर रही थी और बाकायदा चिटर-चिटर की आवाज़ें निकाल रही थी। मैंने अनायास ही इसे स्नेह भरा निमंत्रण समझ लिया। अपने परांठे में से आधा, छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर उसके लिए रख दिया।
मैंने देखा, मेरे वहां से हटते ही वो खाने पहुंच गई। एक टुकड़ा उठाया, अपने अगले दोनों पैरों से पकड़ा और लगी स्पीड से कुतरने। उसे ऐसा करते देख मैंने खिड़की से उसकी वीडियो भी बना ली। इस बीच पीली आंखों वाली काली चिडिय़ा भी आ गई। ये मेरा अपना अनुभव कहता है कि जब भी आप चिडिय़ों को दाना, खाना, पानी डालना शुरू करते हैं, तो सबसे पहले ये पीली आंखों और चोंच वाली बड़ी सी काली चिडिय़ा जिसे आम भाषा में ‘काबर’ भी कहते हैं, आती है। साथ-साथ वो अपनी पुरानी छोटी वाली भूरी घरेलू चिडिय़ा आ जाती है। इस क्रम को लगातार कई दिनों तक चलता रहने दें, फिर घुग्गी आना शुरू होती है। इसके बाद कबूतर और अगर आपके डाले हुए दानों पर तोते आने शुरू हो जाएं तो समझिए आप पंछी फ्रेंडली हो गए हैं। लेकिन इनमें से भूरी चिडिय़ा और कबूतर जहां दोस्ती के स्तर तक आ जाते हैं, काली चिडिय़ा और तोते सिर्फ खाने से मतलब रखते हैं। वो दोस्ती तो अलबता करते नहीं, करते हैं तो निभाते नहीं।
खैर, बात टिम्मो गिलहरी की हो रही थी। दोपहर को मैंने उसके लिए लंच में से कुछ चावल निकालकर डाल दिए। एक-दो दिन में उसे मेरा खाने का रूटीन पता चल गया। मैंने देखा कि वो मेरे खाने के समय से कुछ पहले आती, चिटर-चिटर की आवाज़ करती, फिर चली जाती और जैसे ही खाना डाला जाता, वो फिर खाने आ जाती। तीसरे दिन मैंने देखा एक छोटी गिलहरी और आई उसके साथ। ‘छुटकी’ यही नाम रखा होगा टम्मो ने अपनी छोटी गिलहरी का और ना भी रखा हो तो मैंने रख दिया। टम्मो, छुटकी को समझा रही थी कि अभी तू छोटी है, इधर-उधर ज्यादा मत भागा कर। दो वक्त यहीं मेरे साथ आकर खा लिया कर। छुटकी उसकी बात कम सुन रही थी, चावल में से जीरा हटाकर चावलों का मज़ा ज्यादा ले रही थी। मैं चुपचाप छिप कर उन्हें देखती रहती हूं। वो मुझसे अभी उतना खुली नहीं हैं। ये तो जानती हैं कि खाना मैं रखती हूं, पर सामने आते ही भाग जाती हैं। पर छुटकी जल्दी ही वापिस आकर फिर खाने लगती है। टम्मो मां है, ज्यादा डरती है।
पता है, कल क्या कह रही थी छुटकी गिलहरी से। देख छुटकी, तू रोज यहीं से खा-खाकर मोटी होती जा रही है। बस खाती है और जाकर सो जाती है। और ये चावल, परांठा जैसे जंक फूड से तुझे सौ तरह की बीमारियां लग जाएंगी। कितनी बार कहा है, पास वाले पेड़ से जामुन खा लिया कर। फ्रेश फ्रूट खाएगी तो हेल्दी रहेगी। हां, उसकी गुठली मेरे लिए ला दिया कर, शुगर में आराम रहेगा। बेटी ये नए जमाने वाले लोग हैं। पता नहीं कब ये दाना-पानी रखना छोड़ दें। मेहनत करना सीख बेटी, खुद अपना खाना ढूंढना और मनचाहा खाना शुरू कर।
मम्मा आप बेकार में टेंशन मत लिया करो। जब तक मिल रहा है, ऐश से खाओ, ट्रस्ट मी। नहीं मिलेगा तो मेहनत भी करके दिखा दूंगी। वैसे मुझे ये आंटी के डाले आलू के परांठे बड़े पसंद हैं। कोई इन्हें ये और समझा दे कि छोड़ी चिल्ली-सॉस भी छिड़क दिया करें इन टुकड़ों पर। आज मैंने जब सॉस वाले टुकड़े डाले हैं तो छुटकी खुश है, टम्मो नाराज़ है कि मैं उसकी बेटी की डाइट हैबिट अपने जैसी बना रही हूं।
-डॉ. पूनम परिणिता

ये वादियां, ये फ़िज़ाएं...

सुबह उठी तो उठने का मन नहीं था। हल्का सा परदा हटाकर बाहर देखा, दूर-दूर तक सूरज का कहीं नामो-निशान नहीं था। गहरी सर्द धुंध छाई थी, पेड़-पौधे, हवा, पंछी सब मेरी ही तरह बस अंदर से ही झांक रहे थे। उठे कि नहीं, बाहर निकले या फिर, फिर से बिस्तर में अलसाएं। तो भी दुनिया है, दफ्तर है, उठना तो होगा, सो उठे। वहीं सब रोज का रुटीन, दिन में दस बजे के पास, फोन आया, ‘शिमला जाने का प्रोग्राम बन रहा है, चलें क्या?’ अब कहीं घूमने जाने को हर वक्त मचलता मन, भला क्यूं मना करने लगा। हां पहले कह दिया, सोचने का काम मैं बाद में करती हूं। शिमला पहले भी जा चुकी हूं। पहाड़ों की सोहबत तो मुझे पसंद है, पर आप दूर की सोचने लगेंगे तो चक्कर आ जाएंगे।
खैर, अगले दिन सुबह पांच बजे गाड़ी आ गई। तीन जन हम और एक और डॉक्टर दंपति तथा उनके दो प्यारे बच्चे। चल दिए। बस पहाड़ ही नहीं हैं हमारे हिसार में, वैसे सर्दी के मामले में किसी हिल स्टेशन से कम नहीं है। आज भी उतनी ही सर्दी है, पर बच्चों को ढकते-संभालते, अपनी सर्दी का पता नहीं चलता। सफर में जाते हुए एक आदमी ऐसा ज़रूर होना चाहिए जो हर वक्त बोलता रहे या फिर एक से कम एक गानों की ऐसी सीडी हो जो चुपचाप सुनी जा सके देर तक।
अभी हमें चले आधा घंटा ही हुआ था कि एक फोन बजा। पता चला कि डॉक्टर मैडम की कॉल है। सीजेरियन करना है, बरवाला में। दरअसल, हमारे, उनके, हां करने या मना करने का सवाल ही नहीं होता। सब कुछ उपर वाले के नाम से फिक्सड है। अब शिमला जाने को निकले डॉक्टर, पर कोई है जो अभी इस दुनिया में भी नहीं है, पर आपका इंतज़ार कर रहा है कि अपने औजारों के साथ आइए, मुझे बाहर निकालिए और इस दुनिया में लाइए। और फिर अपना शिमला जाइए या फिर कुल्लु-मनाली। सो नियत स्थान, नियत समय गाड़ी रुकी, डॉक्टर साहिबा ने सीजेरियन किया, एक बच्ची रोते-रोते इस जहां में आई, उसकी मां दर्द में भी मुस्कराई और हमारी गाड़ी फिर आगे बढ़ चली, शिमला की तरफ।
इस बार पहले से खबर लेकर चले थे कि बर्फ पड़ रही है और प्रायोजन भी यही था कि गिरती बर्फ देखनी है। वरना पड़ी हुई बर्फ और सर्दी तो पहले भी देख चुके हैं। तय ये हुआ कि हम तीनों रास्ते में शानदार कॉंटीनेंटल में रुकेंगे और डॉक्टर दंपति बच्चों के साथ शिमला जाएंगे और अगर बर्फ गिर रही होगी तो हम भी अगले दिन शिमला जा जाएंगे। अगले दिन सुबह फोन आया कि थोड़ी बर्फ तो गिर ही रही है, आ जाओ। सो, पहुंच गए शिमला, पर बर्फ तो नहीं दिखी। हां, होटल के मैनेजर ने बाहर की तरफ देखकर बताया कि गिर सकती है शायद आधे घंटे तक। पर कोई कह रहा था कि बर्फ देखनी है तो कुफरी जाओ।
अब बर्फ तो देखनी थी, कुफरी की तरफ चल दिए। सिर्फ दस मिनट ही चले होंगे, बस वो नजारा दिखा कि वहीं थम गए। अद्भुत। आकाश से यूं गिर रही थी बर्फ कि जैसे...नहीं मिल रहे हैं शब्द, सिर्फ अनुभव किया जा सकता है उन क्षणों को। किसी के बताए पता नहीं चलेगा। खुद हाथ उठाकर उन सफेद मासूम फाहों को छूकर पता चलता है कि भगवान के पास, इस कड़कती धूप, धूल भरी आंधियों के अलावा भी है तो बहुत कुछ, पर दिखाता कब है, किसे कहां? ये उसे ही पता है। बहरहाल, ऐसे मौसम में बर्फ के बारे में लिखने का मकसद बस इतना ही था गर्मी में भी सर्दी का एहसास। बस यूं ही बने रहिए हमारे साथ। हैप्पी गर्मी।
-डॉ. पूनम परिणिता

नहीं, मैं नहीं देख सकता तुझे...

आम बोलचाल की भाषा में एक कहावत सुनी थी कि ‘और लड़कियां क्या रात को उठ·र खाती हैं।’ जब कभी किसी लड़की के उत्पीडऩ की बात चलती है, तो यह बात अक्सर कही जाती है। तब मुझे इसका मतलब समझ नहीं आता था। पर अब आरूषि के बारे में अक्सर सोचती हूं। तलवार दंपति के बारे में सोच कर परेशान हो जाती हूं। डॉक्टर लोग और लोगों की अपेक्षा थोड़ा लेट शादी करते हैं, अपनी शिक्षा पूरी करने के चलते। तो बड़ी उम्र में शादी हुई होगी और फिर प्यारी सी बेटी आरूषि। आरूषि की आंखें बड़ी-बड़ी, गोल, खूबसूरत थीं। चूंकि दोनों वर्किंग थे, फिर भी उसके लिए पूरा वक्त निकाला होगा। कभी मिल कर मालिश करते होंगे, कभी नहलाते होंगे।
शुरू के दो महीने तो किसी दंपति को नहीं भूलते, जब दिन और रात बराबर हो जाते हैं। रात को एक हाथों में झुलाता है, नींद आंखों में भरे उसके सोने का इंतजार करता है। फिर रातों को दूध बनाकर लाने की बारी भी आई होगी। आरूषि के बाल, पता नहीं शुरू से ही लंबे रखे थे क्या तलवार दंपति ने। बालों की दो चोटियां बनाकर आगे दोनों तरफ हेयर पिन लगाकर खुश होते होंगे। फिर पहला बर्थ डे, कितने प्लान बनते-बिगड़ते हैं, सबको बुलाकर बड़ी पार्टी रखें या फिर बस पड़ोस के सारे बच्चे बुलाकर घर में ही केक काट लें। वर्किंग लोगों के बच्चे बॉय कहना बड़ी जल्दी सीख लेते हैं। दूसरे और तीसरे बर्थ डे के बीतते ही प्ले स्कूल शुरू कर दिया होगा। घर में ऐशो आराम, खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। और होती भी तो, बच्ची के लिए कोई कमी कभी न होने दी होगी। नौकर-चाकर, माली, ड्राइवर ध्यान रखते थे आरूषि का। इसीलिए कभी उनके भरोसे छोड़ दिया जाता होगा उसे। आरूषि थोड़ी कमजोर थी, सो बचपन में बीमार भी ज्यादा होती होगी, तब डॉ. तलवार अपने हर तरह के जरूरी काम छोड़कर सिर्फ उसे संभालते होंगे। दूसरी-तीसरी क्लास के अच्छे मार्कस देखकर दोनों ने सोचा होगा, आरूषि भी डॉक्टर बनेगी बड़ी होकर।
कभी आरूषि को किसी फ्रेंड के बर्थ डे पर जाना होता तो डॉ. तलवार खुद छोड़कर आते। बड़े डरते-डरते स्कूल टूर पर भेजते और जब तक वापस न आ जाती, बड़े बेचैन से रहते। कभी काम से फुर्सत ले फैमिली टूर पर जाते होंगे। आरूषि के लिए उसकी पसंद की ढेरों ड्रेसस लाते, आरूषि को जींस-टॉप के साथ कैप लगाना भी पसंद था। जब आरूषि थोड़ी बड़ी होने लगी, मम्मी ने अच्छे-बुरे बारे समझाया होगा, लेकिन काम में व्यस्तता के चलते, शायद खुद नहीं समझ पाईं। वर्किंग पेरेंटस के बच्चों को धीरे-धीरे मम्मी-पापा का काम पर जाना भाने लगता है, उस वक्त वो पहले देर तक टीवी, फिर कंप्यूटर, फिर इंटरनेट देखकर बिताने लगते हैं। या कभी-कभी फ्रेंड्स को घर पर बुलाते हैं। थोड़ी अकेलेपन की छूट जरूर लेते हैं। घर के नौकर, घर के हर शख्स पर अपनी पैनी नजर रखते हैं। उनकी पसंद-नापसंद को बारीकी से परखते रहते हैं। फिर घर पर ज्यादातर अकेली रहती आरूषि का भी नौकर के साथ ही ज्यादा वक्त बीतता होगा। यूं कभी कांच का टुकड़ा आरूषि के पैर में लगा होगा या कभी साइकिल से गिरकर घर आई होगी तो पापा ने प्यार से सहलाते, उसकी चोट को साफ कर पट्टी बांध दी होगी। उसके आंसू पोछते कहा होगा-मेरी बहादुर बेटी है। यूं छोटी सी चोट पर थोड़ी ना रोते हैं।
फिर एक दिन अचानक जब आरूषि अपने कमरे में पढ़ रही थी, कुछ आवाजें सुनकर दोनों उसके कमरे की तरफ गए और वहां जो देखा, बर्दाश्त नहीं हुआ। शायद किसी भी मां-बाप से ना हो, कभी ना हो। बच्ची की वो हालत, नौकर की वो हिमाकत। कोई नहीं समझ सकता, उस भावना के तूफान को। समझ, बुद्धि ने काम करना बंद कर दिया होगा। अपने प्यार का ये सिला, नमकहरामी नहीं सहन कर पाए होंगे। पता नहीं, अभी तो केस की सुनवाई बाकी है। दलीलें और तहरीरें बाकी हैं। पर कोई सब कुछ जानता है। पर अगर किसी की ज़िंदगी को किसी गलत काम करने पर माफ नहीं किया जा सकता तो अपनी ज़िंदगी बचाने की इतनी जद्दोजहद क्यूं।
डॉ. पूनम परिणिता

ज़िंदगी यूं ही चलती रहे

आज एक बड़ा सा फ्लैक्स बोर्ड देखा, अनाज की भरपूर पैदावार बारे था कि हरियाणा में गेहूं की बंपर पैदावार। पता नहीं क्यूं मन किया कि कोई इतने बड़े बोर्ड के दायीं ओर निचले कोने पर अखबार की वो कटिंग लगा दे जिसमें दिखाया गया कि बंपर पैदावार कैसे सिर्फ बोरियों में भरे जाने के अभाव में सड़ रही है। शहर में एक और बड़ा सा बोर्ड किसी कॉलेज की लड़कियों को दर्शाता हुआ लगा है। कोई इसके भी बायें कोने पर, अखबार में आयी ‘अपना घर’ से लापता युवतियों की तस्वीर लगा दे।
अब इसमें दो बातें गौर करने की हैं। पहली तो तस्वीर लगा दें और दूसरी कि कोई और लगा दे। मैं और मेरा मन तो जैसे निमित मात्र हो सकते हैं। बस अंदर ही अंदर आग जलती है, चिंगारियां सुलगती हैं, बस एक हाथ चाहिए जिस पर ये जलते शोले रख दें। और फिर हमारा काम खत्म। फिर देखें, कैसे वो हाथ पहले खुद को जलाते हैं, फिर दुनियां को रोशन करते हैं। पर इसमें भी कोई हमारे योगदान को न भूले। पता नहीं कब ये तलाश मुकम्मल होगी। हर किसी को कोई ऐसी आदिम सीढ़ी चाहिए कि उसकी गर्दन पर सवार हो देख पाए दूसरी ओर का शाइनिंग इंडिया।
फिर एक सवाल खुद से ही किया, क्यूं कभी मन ये नहीं करता कि पिछले स्टोर में बेकार पड़ी अनाज की खाली बोरियों में से ज्यादा नहीं तो दो-चार बोरियां वहां दे आऊं, अपने हिस्से का योगदान करूं, दो बोरी अनाज तो खराब होने से बचाऊं और अगर बस अपने हिस्से का काम सब कर दें तो फिर किसी को तलाश कर लाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। क्यूं राह चलती, रेड लाइट पर खड़ी, बीकानेर की दुकान के सामने घूमती, मॉल के रास्ते में कपड़े खींच कर भीख मांगती लड़कियों को देख सिर्फ खीज उठती है मन में। क्यूं? बस ये लगता है कि ये काम नहीं कर सकतीं। हमेशा एक काम वाली लड़की नजर आती है उनमें।
कभी मन ये क्यूं नहीं करता कि इनमें से किसी एक की जिम्मेवारी मेरी, उसे थोड़ा पढ़ाने-लिखाने की, बस पढ़ाई के मायने भर समझाने की, उसे इतनी समझ देने की, कि वो ज़िंदगी में कुछ और भी कर सकती है। इससे बेहतर। आखिर इसी तरह की लड़कियां तो पहुंचती हैं ‘अपना घर’, अपनों के अभाव के चलते। कुछ करना तो होगा। कुछ करना तो है। कब, कैसे की उहापोह में ही आधी ज़िंदगी निकल चुकी है। फिर भी शुरुआत के लिए कभी देर नहीं होती।
एक बात और, आजकल रिजल्ट का मौसम है। तमाम तरह के रिजल्ट आ रहे हैं, बच्चे उपलब्धियों से खुश हैं, पेरेंट्स के चेहरे खिले हैं। पर कुछ मायूस मन भी हैं जो इस बार वो मंजि़ल नहीं पा सके जिसकी दरकार थी। ये भी जानती हूं कि सांत्वना के बोल बड़े चुभते हैं मन को। पर उस हाथ की जरूरत हमेशा रहती है जो कंधे को थपथपा कर, मन को हल्का कर दे। सो पेरेंट्स और दोस्त, प्लीका बने रहे उस मायूस मन के पास। समझाएं उसे, ज़िंदगी अभी बस नहीं हुई है, कि ज़िंदगी कभी बस नहीं होती और बच्चे भी रैंक की दुनिया से इतर, कुछ और सोचें। कि ज़िंदगी बार-बार मौके देती है। आपको बस इतना करना है कि उसकी रवानगी को बरकरार रखें। यूं बहती रहते देंगे तो ही कहीं न कहीं, घनी छांव के, प्यारे छोर भी मिल ही जाएंगे।
डॉ. पूनम परिणिता

ना तुम हमें जानो...

आज भारत भूषण अग्रवाल की एक कविता पढ़ी। ‘मैं और मेरा पिट्ठू।’ फिर मुझे अपनी उस अलिखी, माने जो लिखी नहीं गई, कविता की याद आ गई। ये रिश्तों और आपसी समझ के बारे में है। कि-जानती हूं, तुम उसे जानते हो, जो सुबह पांच बजे अलार्म के साथ उठ जाती है, बिखरे बालों को, उंगलियों से साधती पीछे को बांधती, सीधे रसोई में चली जाती है, बच्चे और तुम्हारे टिफिन में, फिर कुछ नया, कुछ जादुई, कुछ सेहतमंद सा डालने। पर क्या तुम उसे जानते हो, जो चाहती है, सोना देर तक, तुम्हारी बगल में, यूं ही बिखरे बालों के साथ।
हां जानती हूं, उसे तो, तुम, अच्छे से जानते हो, जो तुम्हें देकर तुम्हारे कपड़े, टॉवेल, हो जाती है तुम से पहले तैयार, और देखती है तुम्हारे मूड की बाट, कि क्या बिना कोई मुंह बनाए, छोड़ दोगे ऑफिस तक। पर, क्या तुम उसे जानते हो, जो, बस रहना चाहती है घर पर, हमेशा, ताकि रख सके, अपने, नए लाए फ्लॉवर पॉट में, अपने चुने हुए ताजे फूल।
हां, हां, तुम उसे तो भले ही जानते हो, जो, सर से ढलते, सरकते, पल्लु को वापिस सर पर रखने की नाकाम कोशिश करती, रखती है खुश, तुम्हारे तमाम छोटे-बड़े रिश्तों को, पर उसे जानते हो क्या, जो ढीली टी-शर्ट और लोअर पहने, चाहती है बस, घंटों बतियाना, अपनी मां से फोन पर।
और, उसे तो अब जान ही गए हो, जो स्कूटर, कार उठाए, कर देती है, तुम्हारे, बच्चों के, घर के, हर अंदर-बाहर के काम, और तुम्हें इतिला हो जाती है कि-ठीक किया, पीटीएम जा आईं। पर उसे जानते हो क्या, जो चाहती है दिन भर में याद आई चीजों की लिस्ट बनाना और तुम्हें थमाना, ना चाहते हुए भी, ऑफिस से आते ही। और उसे तो तुम जानकर थक चुके हो, जो बैठ जाती है, रात देर तक के लिए, हाथ में कोई किताब लेकर, जब तुम चाहते हो, चैन से सोना, लाइट बंद कर। पर उसे कब जाना। जो चाहती है, ये कहानी, ये कविता पढऩा तुम्हारे साथ-साथ, ताकि जान सके कि, कितना जाना तुमने मुझे, और कितना तुम जान सके।
अब ये तो हुई कविता, इसके बाद इसकी नारियों पर दो तरह से प्रतिक्रिया हो सकती है। एक तो कि ‘अच्छी है’ और फिर अपनी पहली सी भूमिका में मशगूल। और दूसरी कि किसी तरह उन्हें (जिनसे ये कविता बावस्ता है) ये कविता पढ़वाई जाए और लगातार उनके एक्सप्रेशन नोटिस किए जाएं। और फिर उनकी क्रिया पर जोरदार जवाबी प्रतिक्रिया की जाए (ऐसी कि न्यूटन भी थर्रा उठे और कहे, मैंने ऐसा तो नहीं कहा था)।
अब उनकी भी प्रतिक्रिया दो तरह की हो सकती है। एक तो ये कि-हां जी, पढ़वाओ और फिर पढ़कर वही हल्की सी-हां, ठीक है, मतलब अच्छी है। या फिर ये कि-भागवान, दरअसल मैं तो जानता ही कविता की दूसरी वाली पात्र को हूं। और दो, जिसका जिक्र पहले है, जिसे कि कहा गया है, उसे तो तुम जानते हो। मेरा भगवान जानता है कि ऐसी एक पत्नी मैंने चाही जरूर थी, पर वो जिसे मैं सचमुच जानता हूं। जिसे भगवान ने मुझे बख्शा है, वो बाखुदा वो वाली है जिसका जिक्र बार-बार ये कह कर किया है कि-पर, क्या तुम उसे जानते हो? भई, जानता हूं, खूब जानता हूं, ना सिर्फ जानता हूं, बल्कि भुगत भी रहा हूं।
देखिए, वास्तव में, मेरा इरादा तो बस, कविता का ही था। आप लोगों की पर्सनल जान-पहचान में दखलंदाज़ी करने का तो बिल्कुल नहीं था। बहरहाल, यूं ही मीठी नोक-झोंक के साथ खुश रहें।
-डॉ. पूनम परिणिता

मेहमां जो हमारा होता है...

शायद कुछ लोग मुझे सिर्फ इसलिए भी मिल जाते हैं कि मैं अपना ब्लॉग बिना नागा लिख सकूं। तो इस बार मुझे मिली आंद्रया। थोड़ी अलग तो वो सिर्फ इसी से हो जाती है कि वो एक जर्मन लड़की है। लंबा, ऊंचा कद और बिंदास पर्सनाल्टी तो वैसे ही विदेशियों की खास पहचान है। शुरुआती जान-पहचान में उसने बताया कि उसने पढ़ाई-लिखाई फैशन डिजाइनिंग में की है, जिसे उसने सिर्फ इसलिए छोड़ भी दिया कि कोई ये कैसे जज कर सकता है कि मेरा बनाया डिजाइन बढिय़ा नहीं है। और ये कि सिर्फ सिलाई, कढ़ाई, बुनाई तो अच्छी-बुरी परखी जा सकती है, पर किसी की क्रियेटिविटी हरगिज नहीं।
खैर, इस उधेड़बुन से निकलकर वो भारत यूं पहुंची कि उसे हॉकी खेलने का शौक है, सो बच्चों को हॉकी खेलना सिखाना शुरू कर दिया और आज एक एनजीओ के तहत राजस्थान के दौसा जिले के छोटे से गांव में किसी गरीब परिवार के साथ रहकर उस गांव और आसपास के गांवों के छह से पंद्रह साल के बच्चों को हॉकी खेलना सिखा रही है। और इस सबसे वो बेहद खुश है। उसे एडवेंचर पसंद है और राजस्थान से चेन्नई, महाबलीपुरम तक की यात्रा ऑटो रिक्शा से कर चुकी है। वो इस बात से भी खुश है कि जिस गांव में वो रह रही है, जिस जगह गुजर-बसर कर रही है, वो किसी महाराजा का पुराना किला है। यह अलग बात है कि उसमें बिजली व्यवस्था ऐसी है कि कभी-कभी चौबीस घंटे तक बिजली नहीं होती, शुरू में उसे अपना कमरा 20-25 चमगादड़ों के साथ शेयर करना पड़ा।
जिन बच्चों को वो खेलना सिखाती है, वो उसे कोई प्राइवेसी या कहें अपना स्पेस नहीं बरतने देते। पर इस बारे में वो कहती है कि मैं इसका जरा भी बुरा नहीं मानती, क्योंकि पहले मैंने इनकी ज़िंदगी में दखलअंदाजी की है, इन्होंने तो ये काम बाद में शुरू किया है। उसने 19 साल की उम्र में घर छोड़ दिया था। आज वो एक भारतीय दोस्त से शादी करना चाहती है, पर उसके किसान मां-बाप को अपनाना और साथ रखना नहीं चाहती। वो उन्हें पसंद करती है, पर अपनी लाइफ में उनका इंटरफेयरन्स बर्दाश्त नहीं कर पाएगी। उसने बताया कि लड़का समझाने की कोशिश कर रहा है अपने मां-बाप को और शायद सफल भी हो जाएगा। वो कहती है कि भारतीय मां-बाप अपने बच्चों को इसलिए प्यार से पालते हैं कि बूढ़े होने पर वो उनकी देखभाल कर सके और ये तो बहुत बड़ी खुदगर्जी हुई।
दरअसल, वो नहीं जानती कि तीन सौ साल की गुलामी का इतिहास है हमारा, असुरक्षा की भावना हममें खून के आगे-आगे दौड़ती है। हम एडवेंचर करने निकलें तो घर से निकलते अगर बादल छाए दिख जाएं तो छाता लेकर निकलते हैं। मां दो-तीन दिन का खाने-पीने का इंतजाम साथ बांध देती है। हमें सेफ सा एडवेंचर पसंद है। और रही बात बच्चे पालने की तो जैसा उसने खुद बताया, एक गरीब परिवार भी मेहमान को बरसों रखने का जिगर रखता है। और मां-बाप की सेवा करना, बड़ों का आदर करना, मेहमाननवाजीक·रना, ये तो हम बच्चों को यूं ही प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए ही सिखा देते हैं, क्योंकि हमारे देश में वृद्धाश्रम अभी सिर्फ सरकारी तौर पर खुले हैं, ये प्राइवेट बिजनेस में नहीं आए हैं और अभी इनमें रहने वाले बुजुर्गों की संख्या अपेक्षाकृत काफी कम है। शाम के वक्त जब मैं उससे मिलने गई तो उसने बताया कि अभी तो वो थोड़ी देर कुछ लोगों के साथ बीयर पीएगी। हे भगवान, फिर वही असुरक्षा की भावना, ये छोटी-छोटी बच्चियां, हॉकी के साथ-साथ कुछ और तो ना सीख लेंगी इससे।
डॉ. पूनम परिणिता

आया रे खिलौने वाला...

बात थोड़ी पुरानी जरूर है, पर इतनी भी नहीं कि इसे रिकॉल ना किया जा सके। कुछ औरतें आती थीं, मैले कुचले से घाघरा, चुनरी पहने। सर पर एक छाबड़ी, एक हाथ की उंगली से खिंचता बच्चा और दूसरे हाथ से एक डुगडुगी बजाती। डमरू जैसी बजती उसे आवाज में कुछ तो बात थी कि बच्चे सब मम्मियों को बाहर ले जाते, फिर उसकी छाबड़ी को घेर कर खड़े हो जाते और वो खुरदरी सी आवाज को भरसक मधुर बनाने की कोशिश करते हुए अपने पिटारे से निकालती, मिट्टी का एक डमरू और मिट्टी की छोटे-छोटे पहियों वाली गाड़ी। अब लड़के जहां उस गाड़ी को चलाकर दिखाने की जिद करते, लड़कियां चाहती कि वो अपने हाथ वाली डुगडुगी उन्हें बेच दे, क्योंकि और कोई भी डमरू या डुगडुगी वैसी आवाज ना निकाल पाते, जैसी उसके हाथ वाले खिलौने से निकलती थी।
बात फिर मोल-भाव पर आती, बेहद सस्ते खिलौने होते थे वो, और ज्यादातर तो आटा, चीनी से भी कम दाम पर। फिर जब वो बिजनेस खत्म कर उठती तो थोड़ी दूर उसकी तान के पीछे जाते, पर फिर मां की आवाज के साथ वापिस अपनी चारदीवारी में जा, अपने खिलौनों से खेलने में मस्त हो जाते। ये खिलौने बस ही देर तक चलते, अमूमन जब तक उसकी डुगडुगी की दूर तक आवाज आती। बस उसके बाद तो डमरू का एक तरफ का बजाने का टुकड़ा टूट कर हाथ में आ जाता और गाड़ी का पहिया भी एक तरफ जा गिरता। इसके साथ ही इन खिलौनों के स्पेटर पार्टस के लिए उस खिलौने वाली को गेट से दोनों तरफ नजर दौड़ा-दौड़ा कर गली के छोर तक ढूंढा जाता, हालांकि किसी पिछली गली से उसकी आवाज तो आ रही होती, पर उसे ढूंढना आसान नहीं होता था। थोड़ी देर कुछ जुगाड़ की कोशिश की जाती, लेकिन थक-हार कर फिर उस खिलौने का पोस्टमार्टम कर दिया जाता। डमरू के भीतर छेद करने में तो वाकई मजा आ जाता।
बच्चों को अगर उनकी दुनिया में उनके हाल पर छोड़ दिया जाए तो वो हर चीज में अपनी खुशी ढूंढ लेते हैं। मुश्किल तब होती है जब अपने बड़े-बड़े, अधूरे सपनों का, उनके सपनों की दुनिया से घालमेल कर दिया जाता है। ऐसा ही नजारा दिख रहा था, वाहनों के मेले में। अपने और बच्चों के सपनों का घालमेल। बच्चों की उंगली पकड़े उन्हें बड़ी-बड़ी गाडिय़ां दिखाते, अभिभावक। स्पीडोमीटर की आखिरी लिमिट को पढ़ते बच्चे, रेस और ब्रेक तक पहुंचने नी नाकाम कोशिश करते उनके छोटे-छोटे पैर। बंद गाडिय़ों में भी फुल रेल देते उनके पैर और हाथ। लोगों के सपने देखने की क्षमता को भुनाते सेल्समैन, उनके सपनों को फाइनेंस करने की कोशिश करते फाइनेंसर। हालांकि लगभग सभी बढिय़ा लिबास पहने थे, पर मुझे जाने क्यूं वो छोटी-छोटी चादर लपेटे नजर आए जिसके बाहर उनके पैर झांक रहे थे। मगर मैंने पाया कि आजकल चादर को, सबने, एक साथ बाहर निकाल स्टाइल से ओढऩा शुरू कर दिया है। फिर पैसे की फिक्र कौन करे। मैं जोर-जोर से बजते डीजे में कहीं उस खिलौने वाली की डुगडुगी की आवाज को महसूस करना चाहती थी।
-डॉ. पूनम परिणिता

ये जो मन की सीमा रेखा है...

हाल ही में सचिन और रेखा के राज्यसभा में मनोनीत किए जाने के लिए नाम तय हुए हैं। यह राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्ति है या कहिए उनका अधिकार है कि वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली शख्सियतों को राज्यसभा के लिए नामित कर सकते हैं और इसमें कोई शक नहीं कि सचिन व रेखा दोनों अपने फन में माहिर हैं, लेकिन जब से दोनों का नाम अनाउंस हुआ है, ये मीडिया में सुर्खियों में हैं। बस इसी का नाम राजनीति है। अब ये मुंह खोलेंगे तो मीडिया अपने हिसाब से उसके मायने तय करेगा और जुबां बंद रखेंगे तो उसका अर्थ भी अपनी भाषा में बांचेगा।
बाखुदा, जितना सब लोग जानते हैं। सचिन और रेखा दोनों अपेक्षाकृत कम बोलने वाले लोगों में से हैं, लेकिन दोनों के बारे में वाकयुद्ध लगातार जारी है। सचिन का तो फिर भी राजनीतिक कैरियर तय किया जा रहा है, उन्हें मौखिक रिटायरमेंट दी जा रही है, लेकिन रेखा, उनकी गरिमामयी चुप्पी पर क्यों सवालों का सैलाब ढाया जा रहा है। संसद में सिलसिला...क्या होगा जब जया से मिलेंगी रेखा। रेखा और अमिताभ की प्रेम गाथा सत्तर-अस्सी के दशक के दर्शकों के लिए ‘राजुकमारी की प्रेम कहानी’ जैसी है। इन्होंने इन दोनों की प्यार की कहानी को अपनी आंखों से पढ़ा है। सिलसिला सिर्फ फिल्म नहीं, इन तीनों ज़िदगियों की सच्ची दास्तान थी, एक सच्चे अंत के साथ जिसमें अमिताभ अपनी जीवन संगिनी का साथ निभाने का फैसला लेते हैं। और उसे फिल्मी परदे से इतर, आज तक निभाते आ रहे हैं।
एक तेज है सबके चेहरे पर, अमिताभ में अपनी गरिमा और निष्ठा है, जया पर अपने सतीत्व का और रेखा पर अपने प्यार का और सभी इस ओज को बनाए हुए हैं। जाने क्यूं-क्यूं दर्शाया जा रहा है कि रेखा पहले दिन सदन में जाते ही, जया को देखते ही, जाने कैसे रिएक्ट करेंगी। बस उस एक पल को, चेहरे पर आते-जाते भावों को, आंखों की उस भाषा को हर चैनल अपने हिसाब से पढ़ेगा और गढ़ेगा। टीआरपी की एक नई इबारत। पर वो नहीं जानते, अमिताभ, रेखा और जया उस वक्त के मंझे हुए कलाकार हैं, जब ये ब्रेकिंग मीडिया पैदा ही नहीं हुआ था।
रेखा जानती हैं कि इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों है, फिर यूं ही थोड़े ना, पढ़े लेने देंगी, इन आंखों की भाषा सभी को। फिर इन्हें तो भगवान ने भी जाने क्यूं पैसा, शोहरत, कला सब कुछ देते हुए भी प्यार से महरूम रख दिया। सुरैया, मधुबाला, मीना कुमारी की ही अगली कड़ी का नाम है रेखा। जब हम ही रेखा का नाम आते ही जहन में अमिताभ को स्वत: ही ले आते हैं तो रेखा का कसूर कब है। सिलसिला फिल्म का ही एक डॉयलाग है, जब अमिताभ कहते हैं-वो कब का, सब कुछ पीछे छोड़ आए थे, भूल चुके थे, पर वक्त ने फिर से इसे सामने लाकर खड़ा कर दिया है तो....लेकिन, ये बस कलाकार, जब झूठा अभिनय करके आपको, हमको हंसा, रुला सकते हैं तो क्या अपनी असल ज़िंदगी में अपनी गरिमा बनाए रखने को असली अभिनय नहीं कर सकेंगे। तो स्वाद के चाटुकारों के हाथ कुछ नहीं आने वाला। रेखा सदन में जाएंगी, जया को देखेंगी, फिर प्यार से दोनों गले मिलेंगी और एक ही राह के मुसाफिर होते हुए भी चल देंगी अपनी-अपनी राह।
डॉ. पूनम परिणिता